August 14, 2017

कैसे हुआ था भारत आज़ाद मंडी शहर में



भारत की स्वतन्त्रता की घोषणा 14 अगस्त 1947 रात के ठीक बारह बजे हुई थी और इसी के साथ भारत एक आज़ाद देश बन गया था।  सारे भारत में उस दिन समारोह हुए थे। उस ऐतिहासिक दिन हमारे शहर मंडी में भी एक समारोह हुआ था जो मुझे अच्छी तरह याद है। मेरी उम्र तब आठ साल थी।
आज का मंडी शहर 
       पर इस समारोह के बारे में बताने से पहले मैं अपने उन मित्रों को जो मंडी के निवासी नहीं हैं, मंडी के बारे में कुछ जानकारी देना चाहूँगा. मंडी हिमाचल प्रदेश का एक छोटा शहर है और अब जिला भी है. स्वतन्त्रता से पहले मंडी एक रियासत हुआ करती थी जिस पर उस समय राजा जोगेंद्र सेन राज किया करते थे. स्वतंत्रता के बाद इस रियासत का हिमाचल प्रदेश में विलय कर दिया गया और इस के साथ एक अन्य रियासत सुकेत को मिला कर आज के मंडी जिले कया गठन किया गया. मंडी उस समय की काफी प्रगतिशील रियासतों में एक थी. यहाँ बिजली थी, दो तीन हाई स्कूल थे, हॉस्पिटल था, टेलीफोन भी थे. उस समय मंडी में हिमाचल के सबसे ज्यादा पढ़े लिखे लोग थे.

मंडी के तत्कालीन शासक राजा जोगिन्द्र सेन 


       रियासत के दिनों हमारा परिवार पैलेस (जहां अब सोल्जर बोर्ड तथा फौजी केंटीन है) के स्टाफ क्वार्टरों में रहता था। मेरे स्वर्गीय पिता मियां नेतर सिंह राजा मंडी के निजी स्टाफ में थे. निजी स्टाफ के लगभग सारे कर्मचारी उन स्टाफ क्वार्टरों में रहा करते थे। उस दिन क्वार्टरों के निवासियों में कुछ विशेष हलचल थी और सब बड़े आपस में यह कह रहे थे की आज रात को आज़ादी आएगी।
       हमारे साथ वाले क्वार्टर में मिस्त्री शेर सिंह रहते थे। पैलेस के बिजली से जुड़े सारे काम उनके जिम्मे थे। पैलेस के तमाम बिजली के उपकरणों का रख रखाव भी उन्हीं ज़िम्मेदारी थी। इन उपकरणों में दो सिनेमा प्रॉजेक्टर भी थे जिन पर कभी कभी वो हमको कार्टून फिल्मे दिखाया करते थे जो शायद पैलेस में राजकुमार (आज के मंडी के राजा अशोक पाल सेन, जो शाम को अक्सर राजमहल होटल में टीवी देखते रहते हैं) और राजकुमारी के देखने के लिए मंगाई हुई होती थीं। इस कारण मिस्त्री जी (उनको हम इसी नाम से संबोधित किया करते थे, उन दिनों अंकल आंटी का रिवाज अभी नहीं चला था) हम बच्चों में बहुत लोक प्रिय थे। 

हम बच्चों को वह ऐतिहासिक क्षण दिखाने वाले 
मिस्त्री शेरसिंह अपनी धर्मपत्नी जसोदा के साथ 

       आज़ादी का समारोह चौहटे में आयोजित किया जा रहा था। शायद आयोजकों की इच्छा हुई होगी की इस विशेष दिन पर समारोह में लाउड स्पीकर भी लगाया जाए। मेरा अंदाजा है कि उस वक़्त मंडी में एक ही लाउडस्पीकर सिस्टम था और वह भी केवल पैलेस में। इसलिए पैलेस से यह साउंड सिस्टम माँगा गया. पैलेस की और से मिस्त्री जी को यह काम सौंपा गया और उन्होंने साउंड सिस्टम तैयार करना शुरू किया। मिस्त्री जी के मन में अचानक यह विचार यह आया कि क्यों न बच्चों को भी आज़ादी आने का यह जश्न दिखाया जाये और उन्होंने मेरी ही उम्र की अपनी बेटी चंद्रा, भतीजे रूप सिंह और मुझे भी साथ चलने को कहा। हम तीनों बहुत ही प्रसन्न थे। 
मंडी के वर्तमान राजा श्री अशोक पाल सेन  

       समारोह के लिए चौहटे की भूतनाथ वाली साइड पर एक मंच बनाया गया था जिस पर दरियाँ बिछायी गई थी। मंच के एक कोने पर मिस्त्री जी ने अपना साउंड सिस्टम सेट किया और लाउड स्पीकर भी लगा दिया। स्टेज पर ही एक छोटा मेज़ रखा गया जिस पर एक रेडियो सैट लगा दिया गया। फिर इस रेडियो के आगे माइक्रोफोन रख दिया गया और इस के साथ ही रेडियो में चल रहा प्रसारण लाउड स्पीकर में आने लगा। मंच के आगे कुछ दरियाँ बिछा दी गई थीं जिस पर लोग आ कर बैठने शुरू हो गए थे। क्योंकि हम तीनों मिस्त्री जी के साथ थे जो अपने लाउडस्पीकरों के कारण उस समारोह के बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे, इसलिए हम तीनों को को भी वी आई पी ट्रीटमेंट मिला। हम तीनो को आम पब्लिक के साथ नीचे दरियों के बजाय स्टेज पर बिठाया गया, हालांकि बैठे हम वहाँ भी नीचे ही थे।
       उस समय तो मेरी समझ में कुछ नहीं आया था पर अब में समझ सकता हूँ। रेडियो पर शायद कमेंटरी किस्म का प्रोग्राम आ रहा था। स्वतन्त्रता की घोषणा रात को बारह बजे दिल्ली में होनी थी। दिल्ली में चल रहे समारोह की जानकारी वहाँ उपस्थित जन समूह को रेडियो के माध्यम से दी जा रही थी। फिर अचानक जनसमूह में जोश आ गया और लोग खुशी के मारे झूम उठे और नारे लगाने लग गए। ध्वजारोहण भी हुआ था। मुझे याद नहीं कि मंडी में उस रात झंडा किसने फहराया था. शायद स्वामी पूर्णानन्द ने यह काम किया था. उस क्षण शायद दिल्ली में भारत के आज़ाद होने की घोषणा हुई होगी। चौहटे के कोर्ट वाले सिरे पर पटाखे छोड़े जाने लगे। 5-6 हॉट एयर बैलून, जिन्हें बच्चे उस वक़्त “पेड़ू” कहा करते थे, भी छोड़े गए।
       फिर आया हम लोगों के लिए सबसे बढ़िया क्षण। बड़ी बड़ी परातों में गरम गरम हलुआ आया और लोगों में बांटा जाने लगा। आज़ादी क्या होती है इसकी तो हमको समझ नहीं थी, पर उस दिन के हलुए का स्वाद आजतक भी नहीं भूला है। क्यों कि हम मिस्त्री जी के साथ थे और स्टेज पर थे, इसलिए हमको सामान्य दर्शकों से ज्यादा, दोनों हाथों की हथेलियाँ भर के हलुआ मिला और हमने पेट भर के खाया।
       तो ऐसे हुआ था मंडी शहर में भारत आज़ाद।   

August 7, 2017

अमरीका के पोर्टेबल टॉयलेट



खेत में रखा एक पोर्टेबल टॉयलेट
आजकल मोदी जी द्वारा शुरू किये स्वच्छता अभियान के कारण टॉयलेट चर्चा में हैं. आइये आज मैं भी इस विषय पर आप मित्रों को टॉयलेट इस के बारे में अपना एक अनुभव बताता हूँ. क्या आपने कभी चलते फिरते यानि पोर्टेबल टॉयलेट के बारे में सुना है? और वह भी ऐसे स्थान पर जहां हम भारतीय टॉयलेट की आवश्यकता ही नहीं समझते, मेरा मतलब है खेतों में. मुझे विशवास है कि बहुत ही कम लोगों को इस बात का  पता होगा कि दुनिया के एक देश में खेतों में खेत मजदूर ऐसे टॉयलेट का प्रयोग करते हैं. भारत के गाँवों में तो खेत इस काम के लिए सबसे लोकप्रिय स्थान है. पर मैंने अपने अमरीका प्रवास के दौरान ये पोर्टेबल टॉयलेट देखे. इस से पहले मुझे इस बात का ज़रा भी अंदाज़ नहीं था कि कहीं खेतों में निवृत्त होने के लिए कहीं टॉयलेट का प्रयोग भी किया जाता होगा.

       वैसे मैं अमरीका कई बार गया हूँ, पर सन 2005 के टूर में मुझे अमरीका की विश्वप्रसिद्ध नर्सरी, स्टार्क  ब्रदर्स नर्सरी में जाने जाने का अवसर मिला. बात को आगे बढाने से पहले मैं पाठकों को, विशेषकर हिमाचली पाठकों को, इस नर्सरी के बारे में थोड़ी सी जानकारी देना चाहूंगा. यह वह नर्सरी है जहां सेब की डैलिशियस किस्मे रैड, गोल्डन, रॉयल डैलिशियस आदि विकसित हुई थीं. सत्यानंद स्टोक्स सेब की ये किस्मे इसी नर्सरी से हिमाचल में लाये थे. हालांकि हिमाचल में सेब की खेती अंग्रेज इससे पहले शुरू कर चुके थे, पर हिमाचल में सेब की बागबानी इन्हीं किस्मो के आने पर सफल हुई.

नर्सरी के गेट के पास खडा मैं
 
        यह एक बहुत ही बड़ी नर्सरी है और 200 वर्ष पुरानी है. यहाँ रोजाना सैकड़ो मजदूर और कर्मचारी काम करते हैं. इस नर्सरी का इतिहास भी बहुत दिलचस्प है. पिछले 200 सालों में इस नर्सरी में कई उतार चढ़ाव आये. पर इस नर्सरी की कहानी किसी दूसरी पोस्ट में बताउंगा.

       इस नर्सरी में मैंने एक अजूबा देखा। ऐसा मैने अपने जीवन में पहली बार ही देखा हालांकि मैं दुनिया के बहुत देशों में घूम चुका हूँ। यह अजूबा था चलता फिरता शौचलाय। यहाँ काम करने वाले मजदूरों को हमारे यहाँ की तरह निवृत्त होने के लिए खेत का कोई कोना नहीं खोजना पड़ता। वे आराम से जब भी आवश्यकता पड़े तो इस शौचालय का प्रयोग कर सकते हैं। 

अन्य साथियों के साथ नर्सरी में मैं 

ये शौचालय लकड़ी और टीन की चद्दरों से बने होते हैं. इनमें कमोड रखा होता है. पानी और और  टॉयलेट पेपर की भी समुचित व्यवस्था होती है. शौचालयों को सुबह गाड़ियों में लाद कर, जिन खेतों में मजदूरों ने काम करना होता है, वहाँ रख दिया जाता है और शाम को छुट्टी होने पर वापिस ले जाया जाता है। और इनकी सफाई आदि कर दी जाती है.

खेत में रखा एक दूसरा पोर्टेबल टॉयलेट

मेरा इन टॉयलेटो को अन्दर से देखने का मन हुआ पर मैं अपने इस कुतूहल को अपने अन्य साथियों, जो सब अमरीकन थे, पर प्रकट नहीं होने देना चाहता था. इसलिए मैं चुपके से इनके भीतर गया और सारा सिस्टम देखा. फिर चुपके से ही इन शौचलायों के कुछ चित्र लिए ताकि वापिस भारत जाकर अपने साथियों को साथियों को दिखा सकूँ।

आपका क्या विचार है? कभी हमारे खेत मजदूरों को भी ऐसी सुविधा मिल सकेगी?

August 1, 2017

हिरोशिमा और ये हृदयहीन राजनेता


पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हिरोशिमा का दौरा किया था.  इस शहर में सन 1945 में अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराया गया था जिसमें 1,40,000 लोग मारे गए थे. यह विश्व के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक था. लोग सोचते थे कि शायद राष्ट्रपति ओबामा इस नरसंहार के लिए जापानी लोगों से अमेरिका की ओर से माफी मांगें. पर ऐसा नहीं हुआ. 

आधुनिक हिरोशिमा का एक बाज़ार
मुझे 1 990 में जापान जाने का अवसर मिला था. मुझे जापान की सोसायटी फॉर द प्रोमोशन ऑफ साइंस (जे एस पी एस) द्वारा जंगली और कम जाने वाले फलों के उपयोग पर विभिन्न जापानी विश्वविद्यालयों और फल अनुसंधान केन्द्रों भाषण देने के लिए सात सप्ताह की अवधि के लिए आमंत्रित किया गया था. उसी यात्रा के दौरान मैं हिरोशिमा भी गया था.

वह गुम्बद वाली इमारत जिसके ठीक 500 
मीटर ऊपर परमाणु बम फटा था  
यह बम का विस्फोट धरती पर बल्कि जमीन से ऊपर आकाश में, एक इमारत के गुंबद से लगभग 500 मीटर ऊपर (फोटो देखें) फटा था. इस विस्फोट से पूरा शहर अपने अधिकाँश निवासियों के साथ नष्ट हो गया था. 
 
पार्क में मैं और मेरे होस्ट प्रोफ़ेसर हिरोशी यामामूरा 

उन्होंने इस पूरे शहर का पुनर्निर्माण कर लिया है पर उस ऐतिहासिक विनाश के अवशेष के रूप उस गुम्बददार इमारत को बचा कर रखा है और उस इमारत के आसपास एक बड़ा पार्क बनाया है। इस पार्क को हिरोशिमा शान्ति पार्क कहा जाता है. इस पार्क में जापान के विभिन्न भागों से आने वाले लोगों का तांता लगा रहता है. पार्क में तीन चार स्मारक किस्म के स्थल हैं जहां आने वाले लोग दिवंगतों के लिए शांति प्रार्थना करते रहते हैं. यह सिलसिला उस पार्क में दिन भर चलता रहता है.   
पार्क में बने अनेक पूजा स्थलों में  एक
इस पार्क में एक संग्रहालय भी है जहां उन्होंने बम के बाद पीड़ित पुरुषों और महिलाओं के मॉडल, चित्र और कुछ अवशेष रखे हैं। ये मॉडल उस दिन हुए विनाश का बहुत ही भयावह और हृदयविदारक दृश्य प्रस्तुत करते हैं. यह सब देख कर आदमी का मन बहुत ही खराब हो जाता है.  
 
संग्रहालय की इमारत  
इस संग्रहालय को देखने के बाद, मैंने अपने होस्ट प्रोफेसर हिरोशी यामामुरा से कहा, कि वे इस जगह पर जापान में आने वाले उन देशों के शासनाध्यक्षों को क्यों  नहीं लाते जो अभी भी परमाणु शास्त्रों के निर्माण में लगे हैं. मैंने कहा कि मुझे पूरा विश्वास है कि जो भी शासनाध्यक्ष  एक बार इस विनाश की निशानियों को देख लेगा, अपने देश में परमाणु शस्त्र बनाने का विचार तुरंत त्याग देगा.
पर मुझे बहुत ही हैरानी हुई जब मेरी बात पर प्रोफ़ेसर यामामुरा हँसे. उन्होंने मुझे बताया कि विश्व के लगभग सभी शीर्ष नेता इस संग्रहालय को देख चुके हैं. पर अभी तक  किसी पर भी कोइ असर नहीं हुआ. दुनिया में परमाणु हथियारों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है।

राष्ट्रपति ओबामा भी अन्य नेताओं जैसे ही संवेदनहीन निकले.

      पता नहीं ये लोग किस मिट्टी के बने हैं कि परमाणु बम द्वारा हुई तबाही की इतनी भयानक और दर्दनाक तस्वीरों के देखने पर भी इनका मन विचलित नहीं होता.

      आपको कभी जापान जाने कया अवसर मिले तो हिरोशिमा जरूर जाईएगा. 

July 27, 2017

कितनी लाभदायक है यह पौधा रोपण समारोहों की वार्षिक रस्म अदायगी



बरसात का नौसम शुरू हो गया है. सदापर्णी किस्म के पौधों को लगाने का यह सबसे उपयुक्त समय होता है. इसलिए नए पेड़ रोपने का काम शुरू हो गया है.

       इसके साथ ही विभिन्न सरकारी विभाग और कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं, जो अपनी ओर से पौधारोपण कार्य करवाती हैं, भी सक्रिय हो गयी हैं. आये दिन हम अखबारों में विभिन्न सरकारी विभाग, जैसे वन विभाग, आयुष विभाग और बहुत सी कतिपय समाजसेवी संस्थाओं द्वारा आयोजित किये गए पौधारोपण समारोहों के बारे में भी पढ़ते रहते हैं. पूरे देश में ऐसे आयोजनों की संख्या लाखों में हो जाती है. और यह कार्यक्रम देश में आधी सदी से अधिक समय से चल रहा है. सरकारी कार्यक्रम को वन महोत्सव का नाम दिया गया है और इस को अधिकांश प्रान्तों में वन विभाग आयोजित करता है. 

वनमहोत्सव को प्रतिवर्ष देश के हरेक जिले में एक समारोह की ही तरह मनाया जाता है और इस काम पर काफी खर्च भी हो जाता है क्योंकि समारोह में एक “मुख्यातिथि” होता है. मुख्यातिथि के स्टेटस के हिसाब से पब्लिक के लोग होते हैं, सरकारी कर्मचारी होते हैं, शामियाने आदि लगाए जाते हैं और भोजन नहीं तो समुचित चाय पानी के व्यवस्था तो होती ही है. पेड़ लगाने के बाद भाषण होते हैं, खाना पीना होता है और इस प्रकार समारोह समाप्त हो जाता है. अगले दिन के अखबारों में चित्रों सहित समारोह की खबर भी छप जाती है.

पर क्या आप जानते हैं उसके बाद क्या होता है. उसके बाद उस स्थान पर ना तो मुख्य अतिथि, ना पब्लिक के वो लोग व सरकारी अधिकारी जो वहां समारोह में उपस्थित थे और जिन्होंने एक दो पेड़ लगाने का शुभ काम भी किया था, दोबारा जाते हैं. वन विभाग का कोइ मजदूर के दर्जे का कर्मचारी कभी कभार चक्कर मार जाता हो. नये लगे पेड़ों को शुरू में अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है. उनको जंगली या आवारा जानवरों से बचाना पड़ता है. उनकी, खासकर बरसात के मौसम में १५-२० दिन में गुडाई आदि भी करनी पड़ती हैं ताकि अनावश्यक खर पतवार उनका विकास ना रोक दें. बरसात के मौसम के बाद कम से कम एक साल तक उनकी सिंचाई भी करनी पड़ती है. तभी पेड़ ज़िंदा रह सकते हैं. पर ये सब कोइ नहीं करता. पौधारोपण समारोह के बाद सब उन पेड़ों को भूल जाते हैं. परिणाम यह होता है, कि इन समारोहों में लगे अधिकांश पेड़ महीने दो महीने में ही मर जाते हैं. 

मैं मंडी में रोटरी क्लब से जुड़ा हूँ. रोटरी क्लब भी कई बार मंडी मंडी के और आसपास ऐसे पौधारोपण समारोह आयोजित करता रहा है पर परिणाम वही हुआ है जो ऐसे समारोहों का हमेशा से होता आया है यानी आज मुश्किल से कोइ पेड़ बचा हुआ दिखता है.

इस तरह के पौधारोपण समारोहों का क्या लाभ है. क्या यह धन की बर्बादी नहीं है. पूरे भारतवर्ष में पिछले 6-7 दशकों से वन महोत्सव का कार्यक्रम चल रहा है. जिसे अंतर्गत आज तक अरबों खरबों पौधे लगाए जा चुके हैं. पर वे पौधे कहाँ हैं. इनके हिसाब से तो आज पूरे देश में पेड़ ही पेड़ होने चाहिए थे. पर कहाँ हैं वो सब पेड़.
आश्चर्य की बात तो यह है कि अब इस बात को सरकार और जनता में लगभग सभी सभी जान गए है कि इन कार्यक्रमों का अब तक तो कोइ लाभ नहीं हुआ है. शायद कभी हो भी ना जब तक कि इनके कार्यान्वयन में पूर्ण बदलाव किया जाए. पर फिर भी इन कार्यक्रमों की रस्म अदायगी जारी है. 

पिछले दिनों हिमाचल में इसी तरह का एक और तुगलकी कार्यक्रम चला. पूरे प्रदेश लोगों को मुफ्त “मैडीसनल प्लांट्स” बांटे गए. वैसे तो मैडीसनल प्लांट् की कोइ पक्की परिभाषा नहीं है, क्योंकि पौधों के ऊपर लिखी गयी भारतीय पुस्तकों में लगभग प्रत्येक पौधे का कोइ ना कोइ औषधीय गुण बताया गया है, फिर भी हम उस पौधे को आधिकारिक रूप से मैडीसनल प्लांट् कह सकते हैं जो उद्योग में दवा बनाने के काम आता हो. पर इस कार्यक्रम के अंतर्गत भी पौधों का चुनाव और बटवारा कोइ सुनियोजित ढंग से नहीं किया गया. मुफ्त में पेड़ मिल रहे थे, सो जिसके हाथ जो लगा उसने वही ले लिया. बाद में लगाया या नहीं, वो पेड़ बचे या मर गए, ये किसी को मालूम नहीं. ऐसे कार्यक्रम का कोइ लाभ हो सकता था.

नए पेड लगने चाहिए. बल्कि इस काम की देश में आज बहुत आवश्यकता है. पर यह काम सुनियोजित ढंग से विशेषज्ञों की राय के अनुसार होना चाहिए. किस स्थान पर किस किस्म के पौधे की आवश्यकता है, यह विशेषज्ञों द्वारा तय किया जाना चाहिए और उन जातियों के पौधे पहले नर्सरियों में तैयार किये जाने चाहिए. यह नहीं कि जुलाई के महीने में जो भी पेड़ कहीं से मिल गए, वही रोप दिए.

सबसे जरूरी बात जो सबके ध्यान में रहनी चाहिए वह यह है कि पेड़ लगाने का काम पेड़ को रोपने भर का नहीं है. असली काम तो उसके बाद शुरू होता है, यानी उस लगाये गए पेड़ को जिन्दा रखना. इस बात का अंदाजा बहुत कम लोगों को होता है. पौधारोपण कार्यक्रमों के आयोजक इस बात को अवश्य सुनिश्चित करें कि लगाने के बाद इन पेड़ों की देखभाल कैसे होगी. नए पेड़ की  कम से कम दो साल तक पूरी देख भाल करनी पड़ती है तभी वह जिन्दा रहेगा. इस काम के लिए मानव तथा अन्य संबद्ध संसाधनों की आवश्यकता होती है जिसकी व्यवस्था समुचित कार्यक्रम शुरू किये जाने से पहले हो जानी चाहिए.