August 19, 2016

आचार्य रजनीश और उनके अनुयायी



मैंने माँ  आनंद  शीला  द्वारा  लिखी पुस्तक, DON’T KILL HIM – The story of my life with Bhagwan Rajneesh, पढ़ कर समाप्त की है. मुझे संस्मरणात्मक पुस्तकें पढने का शौक है और मैं अक्सर ऐसी पुस्तकें खरीदता रहता हूँ. हालांकि यह सर्वविदित सत्य है की संस्मरणों में या आत्मकथाओं में सब सच नहीं लिखा होता. अपने बारे में सब कुछ बताया भी नहीं जा सकता. बाकी जैसा कि प्रसिद्ध लेखक खुशवंत सिंह ने कहा है, अपने लेखन को मजेदार बनने के लिए थोड़ा नमक मिर्च लगाना भी जरूरी हो जाता है. हो सकता है कि इस महिला ने भी थोड़ा बहुत  कुछ ऐसा किया हो. 
 
आनंद शीला रजनीश की मुख्य सहायिका थी और बहुत वर्षों तक वह इस संस्था की नंबर दो भी रहीं. बाद में, जब रजनीश ने अपना आश्रम पूना से अमरीका के ऑरेगोन को स्थानांतरित कर दिया था, तब उसकी रजनीश से अनबन हो गयी और उनके सम्बन्ध इस हद तक बिगड़ गए कि रजनीश ने आनंद शीला पर संस्था का पैसा हड़पने का आरोप लगा कर ना केवल अपनी संस्था से निकाल दिया बल्कि उस पर पुलिस केस कर दिया जिसके परिणाम स्वरुप आनंद शीला को अमरीका में जेल भी जाना पडा. 

मैंने रजनीश की कोइ भी पुस्तक नहीं पढी है केवल उसके बारे में ही पढ़ा है. मैं एक बार पूना में रजनीश आश्रम देखने भी गया था. अन्दर तो वहां किसी को जाने नहीं दिया जाता, पर बाहर से ही इन लोगों के रहन सहन का अंदाजा लग जाता है. जब मैं  वहां गया था तब रजनीश की मृत्यु हो चुकी थी. पर आश्रम अब भी चलता है और उनके देसी विदेशी अनुयायियों से भरा रहता है. वहां हरेक चीज़ बहुत ही हाई क्लास और  इसलिए महंगी भी है.  

पुस्तक आनंद शीला के रजनीश के सम्पर्क में आने से लेकर उनके अलग होने की पूरी कहानी बयान करती है. मुझे यह पुस्तक बहुत ही दिलचस्प लगी. मैं इसे जासूसी उपन्यास की तरह तकरीबन एक सांस में पढ़ गया.

यह पुस्तक रजनीश और उसके अनुयायियों के कार्यकलाप और रहन सहन का विस्तृत परिचय देती है. मेरी समझ में नहीं आ सका कि रजनीश में ऐसी क्या बात थी कि वह अपने अनुयायियों में इतना लोकप्रिय हो गया था. 

पुस्तक में बहुत बातें लिखी हैं जो पाठक को विस्मित कर देती हैं. रजनीश आश्रम, “आश्रम” था या ऐय्याशी का अड्डा. मैं यहाँ पुस्तक के पृष्ठ १९१ से एक पैरा उद्धृत कर रहां हूँ जो आनंद शीला ने अपने और अपने पहले पति चिन्मय के बारे में लिखा है. रजनीश के अनुयायी कैसे रहते थे, यह इस से पता चल जाता है. 

३१२ पृष्ठों की यह पुस्तक पढने योग्य है. यह अमेज़न पर लगभग १६२ रुपये में खरीदी जा सकती है.    



August 3, 2016

ब्राजील का शहर रियो डि जनेरो



आजकल ओलम्पिक के कारण ब्राजील का शहर रियो डि जनेरो चर्चा में है. मुझे 2007 मे वहां जाने का और कोइ दो सप्ताह बिताने का मौक़ा मिला था. आइये आप को इस शहर के कुछ नज़ारे दिखाते हैं.
शुरू करते हैं वहां के प्रसिद्ध समुद्र तट (बीच) कोपाकबाना से. यह बीच शहर के एक कोने पर स्थित है. इसकी विशेषता मुझे यह लगी कि सड़क की ही ऊंचाई की है. लगता है यहाँ लहरे नहीं उठती वरना सड़क कुछ ऊंची होती जैसी की मुंबई की मेरिन ड्राइव की है. रियो डि जनेरो टूरिस्टों का एक बहुत ही लोक प्रिय शहर है इसलिए इस बीच पर बहुत भीड़ रहती है.
इस बीच की एक विशेषता यह है की यहाँ की सड़क, जिसके किनारे होटल आदि हैं, एक विशेष डिजाइन की बनी है जैसे कि समुद्र की लहरें हों. यह डिजाइन कोपाकबाना का ट्रेड मार्क है.
कोपाकबाना केवल रियो डि जनेरो में ही नहीं है. हमारे हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर में भी है. राजमहल होटल की बार का नाम भी कोपाकबाना है. जो इसी बीच के नाम पर रखा गया है. मंडी के अंतिम राजा जोगिन्दर सेन ब्राज़ील में भारत के राजदूत थे. शायद वे इस सुन्दर बीच का नज़ारा भूल नहीं पाए और उन्होंने यह दूसरा कोपाकबाना बना दिया.
 
 
 
 
 

 

रियो डि जनेरो के बारे में कुछ और
पहला चित्र है इस शहर की एक ऊंची पहाडी पर सीमेंट से बनी ईसा मसीह की विश्व प्रदिस्ध मूर्ती का. इस मूर्ती के गिनती दुनिया के आठ आधुनिक आश्चर्यों में होतीहै. यह रियो डि जनेरो का ट्रेड मार्क है जैसे कि पेरिस का आइफल टावर या दिल्ली का क़ुतुब मीनार. इस मूर्ती के बारे में विस्तार से अगली बार चर्चा करेंगे. यहाँ केवल इतना बता दें आप शहर के किसी भी भाग में खड़े हों, यह मूर्ती आप को दिख जाती है.
रियो डि जनेरो समुद्र और पहाड़ों से घिरा है. लगभग सभी पहाड़ों पर कोई न कोई दर्शनीय स्थल है और वहां से शहर का विहंगम दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखता है. मुझे यह भी बताया गया कि पहाड़ों के कारण यहाँ समुद्र शांत रहता है. अगले चार चित्र ऊंचाई से दिख रहे रियो डि जनेरो शहर के हैं.
अगले चार चित्र रियो डि जनेरो शहर के मुख्य भाग के हैं जिसे वहां का डाउन टाउन कह सकते हैं. वैसे यह बहुत बड़ा शहर है.
अपने ब्राजील के प्रवास में मैंने कुछ नयी बातें नोट कीं. मैं इस देश में दो सप्ताह रहा और काफी घूमा. साओ पालो और इगुआसू भी गया पर मुझे इस सारे प्रवास के दौरान कोइ भी हिन्दुस्तानी नहीं मिला. इसलिए यह भ्रम की दुनिया में कहीं भी चले जाओ हिन्दुस्तानी, विशेषकर पंजाबी सिख, अवश्य मिल जाएगा, गलत साबित हो गया.
ब्राजील के साधारण ढाबा टाइप रेस्तौराओं में अगर आप खाना खाने चले जाएँ तो आपको चावल और राजमाह जिन्हें वो ब्राउन बीन कहते हैं, अवश्य मिलेंगे. यह वहांका बेसिक भोजन है. इसके साथ आप कुछ और ले सकते हैं.
ब्राजील में अल्कोहल मिश्रित पेट्रोल मिलता है.
ब्राजील की भाषा पॉर्चुगीज़ है. हैरानी होती है कि इतने बड़े विस्तृत देश में पुर्तगाल जैसा छोटे से देश की भाषा कैसे छा गयी.
 
 
 
 


 


 

शुगर लोफ़ (Sugar Loaf)
आज आपको रियो डि जनेरो के शुगर लोफ़ के बारे में बताते हैं. यह रियो डि जनेरो को घेरने वाली बहुत सी पहाड़ियों में से एक है. इस की शक्ल काफी विचित्र है. पुर्तगालियों ने इसका नाम शुगर लोफ़ रखा क्योंकि उनके हिसाब से इसकी शक्ल उनके द्वारा बाहर भेजने के लिए बनाए जाने वाले चीनी के पिंडों से मिलती थी.
मेरा पक्का विश्वास है कि यह पहाड़ अगर कहीं भारत में होता तो इसका नाम अवश्य भगवान शिव पर रख दिया गया होता क्योंकि इसकी शक्ल शिव लिंग जैसी है.
शुगर लोफ़ की समुद्र ताल से ऊंचाई १२९९ फुट है. यहाँ केबल कार द्वारा पहुंचा जाता है. बहुत सी केबल कारें इस काम में लगी रहती हैं और लोगों को ऊपर नीचे लाती ले जाती रहती हैं. हज़ारों लोग रोज शुगर लोफ़ पर जाते हैं. ऊपर काफी खुला स्थान है जहां लोग घूम फिर सकते हैं और रियो डि जनेरो के दृश्य का आनंद ले सकते है. पूरा रियो डि जनेरो शहर यहाँ से बहुत ही सुन्दर दिखता है.
सातवाँ चित्र वहां का है जहां से केबल कारें चलती हैं. सारा इंतजाम बहुत ही अच्छा है. आठवाँ चित्र रियो डि जनेरो के उस मोहल्ले का है जहां मेरा मित्र और मेज़बान कार्लोस रहता था. नवें चित्र में कार्लोस अपने घर के गेट पर खड़ा है. अंतिम चित्र में खड़ी दो अफ्रीकी मूल की युवतियां कार्लोस के घर में काम करने वाली नौकरानियां हैं.
अगली बार आपको रियो डि जनेरो की विश्व प्रसिद्ध ईसा मसीह की मूरती के बारे में बताएँगे.

 


 


 






ईसा मसीह की मूर्ती
आज मैं आप सब मित्रों को रियो डि जनेरो की विश्व प्रसिद्ध ईसा मसीह की मूर्ती के बारे में बताऊंगा. यह मूर्ती कोइ पुराना स्मारक नहीं है. यह १९३१ में बन कर तैयार हुई थी पर इतने से समय में यह सारी दुनिया में मशहूर हो गयी. इसे देखने लाखों लोग हर रियो डि जनेरो जाते हैं. अब इस मूर्ती को दुनिया के आधुनिक सात अजूबों में गिना जाने लगा है.
यह मूर्ती समुद्र ताल से ७०० मीटर ऊंची कोर्कोवाड़ो पहाडी पर स्थित है. यह पहाडी तिजुका जंगल से घिरी है. मूर्ती की ८ मीटर पेडस्टल समेत कुल ऊंचाई ३८ मीटर है. इसकी दोनों बाहों का फैलाव २८ मीटर है. मूर्ती सोप स्टोन और कंक्रीट की बनी है. इसका निर्माण फ्रेन्च मूर्तिकार अल्बर्ट कैक्वोट ने कराया था.
मूर्ती बहुत ही सुन्दर है. यहाँ से रियो डि जनेरो शहर का दृश्य बहुत ही मनभावन दिखता है. यहाँ पहुँचाने के किये एक ट्राम किस्म की बिजली से चलने वाले गाडी चलती है. इस गाडी की पटड़ी जंगल में से हो कर गुजरती है और यह सफ़र भी बहुत ही लुभावना है.
ऊपर काफी जगह है. वहां पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है. लोग मूर्ती के सामने खड़े होकर बाहें फैला कर फोटो खिचवाते हैं. मैं भी वैसे ही खड़ा हूँ. उससे अगली फोटो में मैं अपने ब्राजीलियन दोस्तों के साथ हूँ. उससे अगले फोटो में ऊपर खड़े लोग दिख रहे हैं. मैं भी उनके बीच हूँ. उससे अगले
फोटो में ऊपर से रियो डि जनेरो शहर का नज़ारा है.
उससे अगले चित्र में वह ट्राम है जिस पर बैठ कर पर्यटक ऊपर आते हैं. इस सफ़र में मुझे जोगिन्दर नगर से बरोट जाने वाली केबल कार याद आ गयी. वो सफ़र इससे अधिक रोमांचक है. काश इस केबल कार को भी इसी तर्ज़ पर विकसित किया जाता. यह बहुत ही बड़ा टूरिस्ट आकर्षण बन सकता है. यहाँ सबकुछ है. सिर्फ नयी केबल कारें लाने की जरूरत है.
उससे अगले चित्र में मैं अपने मित्र और मेज़बान कार्लोस के परिवार के साथ हूँ. अंतिम चित्र में मैं ब्राज़ील के कुछ बागबानों के साथ हूँ. हम बहुत से लोग एक आम के एक बागीचे में इकट्ठा हुए थे.


 


 
 



 





July 17, 2016

परमात्मा का शुक्र है की मैं उच्च शिक्षित, विद्वान् या ज्ञानी ना हुआ


मैंने कल ही ऋतू नंदा द्वारा लिखी राज कपूर की जीवनी पढ़ कर समाप्त की. मुझे जीवनियाँ और संस्मरण पढने का शौक है और मैं ऐसी पुस्तकें अक्सर खरीद लिया करता हूँ.
इस पुस्तक को पढ़ कर लगा कि वह कितने जीनियस थे. राज कपूर ने स्कूल के बाद पढाई नहीं की थी. ना ही उन्होंने फिल्म निर्माण में कोइ डिग्री या डिप्लोमा किया था. उनहोंने अपनी पहली फिल्म “आग” केवल २३ वर्ष की उम्र में बना ली थे. २४ साल की उम्र में ‘बरसात” बनाई जो एक महान व्यावसायिक सफलता थी. जब वे २७ साल के थे तब उन्होंने “आवारा” बनाई जिसके कारण वे रूस, चीन और अन्य बहुत से देशों में भारतीय राजनेताओं जितने लोक प्रिय हो गए थे.
इस पुस्तक में बहुत से प्रेरणादायक प्रसंग हैं. पर मुझे इस पुस्तक के पृष्ठ १६१ लिखी राज कपूर की इस  बात ने बहुत ही प्रभावित किया.
“ईश्वर का शुक्र है कि मैं उच्च शिक्षित नहीं हूँ. शुक्र है किताबी कीड़ा नहीं हूँ, शुक्र है कि मैं ज्ञानी नहीं हूँ, शुक्र है भगवान् का मैं एक मूर्ख और जोकर हूँ. मैं सीधा सादा और जमीन से जुड़ा आदमी हूँ और इसीलिये अपने जैसे लोगों के साथ संवेदना के स्तर पर एकाकार हो पाता हूँ. मैं आम आदमी के साथ मुस्करा सकता हूँ और उसकी पीड़ा में भागीदार बन सकता हूँ और उसी के सामान फुटपाथ पर बैठ कर उसकी खुशी में शामिल हो सकता हूँ.”
क्या कभी आपको कोइ ऐसा व्यक्ति मिला जो कि इस बात का शुक्र मनाता हो कि ना तो वह उच्च शिक्षित है और ना ही ज्ञानी.